Poetry

क़तरा क़तरा By Anupam Mithas

Know Anupam Mithas

मैं क़तरा क़तरा मौत पी रहा था,
देखने वाले समझे
वो नशे के घूँट पी रहा रहा था,
हर टूटा प्याला
मेरे टूटे दिल की कहानी कह रहा था,

लोग समझते रहे
वो ज़िंदगी का जश्न मना रहा था,
हर पल उसे भुलाने के लिए
मैं मय ख़ाली पैमानों में ढूँढ रहा था,
लोग समझते रहे इक दीवाना
नशे में होशों हवास
गवाँ रहा था,

जब जनाजा मेरा
लेकर ज़माना निकला ,
मेरे ग़म में हर
ख़ाली पैमाना भी रो रहा था।
हर कोई बेवफ़ा नहीं होता
मेरी रूह को तसल्ली दे रहा था,
मैं क़तरा क़तरा मौत पी रहा था ।
🖋अनुपम

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