Poetry

हाहाकार By Satyam Tripathi

आज रुदन करता है ईश्वर करके मनुज सृजन
हाय! बनाया था क्यो, हो गई सब योजना विफल।
लोभ,मोह, मद से लबरेज सभी बैठे है कामी
पापाचारी, अत्याचारी भए सभी कुमारग गामी।
अबला पर ये पौरुष दिखलाते
नर हो कर भी नर को खाते।
आज बैकुंठ पड़ा है खाली
नरक के बाहर भीड़ निराली।
आख़िर कब सुधरेगा इंसान,
कब छोड़ेगा करना बुरे काम।
बढ़ चली सृष्टि प्रलय की ओर,
चहुओर मचा है हाहाकार घनघोर।
–  satyam tripathi

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49 thoughts on “हाहाकार By Satyam Tripathi”

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