Poetry

अल्फ़ाज़ अंदाज़ By Nidhi Mehra

Know Nidhi Mehra

अल्फ़ाज़ अंदाज़ आवाज़ जुदा हो सकती है
पर शायरी गम के मारो की दवा हो सकती है !

न मशहूर न मगरूर
बस लिखने का है फितूर
बरसे है जो बादल किसी प्यासे की इल्तेज़ा हो सकती है!

न करना इश्क़ इस शातिर मिज़ाज़ से …
ज़ीस्त-ऐ – जान फना हो सकती है !

फलक तक फैली हैं जो ज़मीन
और ज़मीन तक फैला है जो आसमा…
किसी कारीगर की कला हो सकती है!

लिखते रहना ऐ मेरी फ़ाज़िल कलम …
जाने कौन सा हर्फ़ कब किसी के लिए दुआ हो सकती है!

महफ़ूज़ है तू शायरे महफ़िल में …
वार्ना तो कोई भी पल दगा हो सकती है!

शायरी सलीका है तेरे जीने का ऐ निधि
दुनिया के लिए यह बेवजा हो सकती है !

-Nidhi Mehra

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