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कवि गोपाल दास नीरज जी

सावन का महीना बारिश की बूंदे।और बारिश की बूंदों के साथ हमारे सहित्यम में फिर से एक कवि से मुलाकात।सावन और बूंदों की बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि जिन कवि और उनकी रचनाओं को हम इस सप्ताह पढ़ेंगे वो हैं जिनके गीतों को हर दिल सावन में गुनगुनाता है और झूम जाता है।जिन्होंने जिंदगी की आखिरी सांस तक बहतरीन शब्दों को गीतों में पिरोया। हर प्यार में धड़कने वाला दिल उन्ही को पढ़ना और सुनना चाहता है।और जिनकी कलम हर दिल मे धड़कती है।हम बात करेंगे हिंदी साहित्य के स्तम्भ कहे जाने वाले साहित्यकार, गीत ऋषि,कवि,शिक्षक और लेखक कवि गोपाल दास नीरज जी की।

नीरज जी का जन्म 4 जनवरी 1925 को आगरा(उत्तर-प्रदेश) में हुआ।बहुत छोटी उम्र में पिता का हाथ सर से उठ गया।इनकी स्कूल से स्नातकोत्तर तक की पूरी शिक्षा उत्तर -प्रदेश से ही हुई।नीरज जी ने स्नातकोत्तर हिंदी साहित्य में की।दिल्ली ,मेरठ ,अलीगढ़ में कुछ समय अध्यापन किया।लिखने का शौंक बेहद था तो लेखनी भी खूब चलती रही।अपनी कविताओं को मंचो तक ले कर गए और मंचो पर खूब लोकप्रिय रहे।इसी लोकप्रियता के कारण नीरज जी के गीतों को हिंदी जगत की फिल्मों में भी जगह मिली और फिल्मों में इनके गीत अत्यधिक प्रचलित हुए।फिल्मों में गीतों को एक नई उड़ान दी।प्रेम के गीत हर दिल की धड़कन बन गए।चाहे वो गीत “लिखे जो खत तुझे हो” या “रंगीला रे”।हर गीत फिल्मी दुनिया मे अलग ही रंग लेकर आया।
अपने ब्लॉग में बी बी सी के संवाददाता ने सही कहा कि “नीरज जी की कविता में शराब से ज्यादा नशा था”
70 के दशक में मुशायरों से लेकर फिल्मी गानों तक साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, निदा फाजली जैसे दिग्गज शायरों का बोलबाला था. उस जमाने में नीरज ने कवि सम्मेलनों को जिंदा करने के साथ फिल्मी गानों के जरिये हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाया और 1991 में पद्मश्री, 1994 में यश भारती, 2007 में पद्मभूषण सम्मान से नवाज़ा गया था.
साहित्य के लंबे सफर के बाद लंबे समय की बीमारी के साथ एम्स में 19 जुलाई 2018 को नीरज जी की साँसों ने उनका साथ छोड़ दिया।वो हमेशा ही यही चाहते थे कि जब साँसे उनका साथ छोड़े तो वो जवां दिल से होठों पर मुस्कान सजाए गीत गाते हुए दुनिया से जाए और दुनिया उन्ही की कविता से उन्हें विदाई दे।ऐसा ही हुआ जब नीरज जी ने दुनिया से विदाई ली तो पूरी दुनिया के लबों पर उनकी एक ही कविता की पंक्तियाँ थी सुप्रसिद्ध कविता……”कारवाँ गुजर गया”……इसी गुजरे हुए कारवां के साथ उनका गीत सच हो गया कि…. “खिलते है गुल यहाँ खिल के बिखरने को”……हिंदी जगत का एक गुल बिखर गया चला गया पर सबके दिलों में बस गया।
“हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे और कारवां गुजर गया”

अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है:……….
“इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

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