Poetry

ख़ाली ख़ाली सा दिन By Anupam Mithas

Know Anupam Mithas

सूनी सूनी है रात ।
भीगी भीगी सी पलकें
बुझी बुझी हैं साँस।

गहरा गहरा सा कोहरा
काली बंजर है रात।
टूटे टूटे से सपने
टूटी टूटी है आस।

बुझी बुझी सी शमा
बोझिल सी है शाम ।
तनहा तनहा सा दिल
चाँदनी है बड़ी बेआस ।

जलती जलती सी बारिश
बूँद बूँद है आग।
कोयल की कूक जैसे
विरह में लगा रही आग ।

धड़कनों के टूटे से तार
टूटा हुआ है कोई साज़
सदियों से गूँज रही
ख़ामोश सी कोई आवाज़ ।

ख़ाली ख़ाली सा दिन
सूनी सूनी है रात।
भीगी भीगी सी पलकें
बुझी बुझी है साँस ।

🖋अनुपम ‘मिठास

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